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शनिवार, 8 मई 2010

कभी-कभी ही बोलता है बड़ा गुंडा

आम आदमी। अक्सर खामोश रहता है। बोलने से बचना चाहता है। हमेशा कोशिश करता है नहीं बोलने का। सियासतदा उसे मजबूर करते है। बोलने के लिए। फिर भी वह चुप रहता है। खामोश। लेकिन, जब यह आम आदमी बोलता है तो खूब बोलता है। नेपाल इसका गवाह है। आम लोगो की यही ताक़त माओवादियो को खामोश कर देती है। ये वो माओवादी हैं जिनसे सरकार भी डरती है। इनके नेता बडबोले हैं। कार्यकर्त्ता आक्रामक। पर जब जनता बोली तो बडबोलापन और आक्रामकता हवा हो गयी। पर सवाल बरक़रार हैं। बोलने के बाद, अपनी ताक़त का एहसास करने के बाद, क्यों चुप हो जाती है जनता? पता नहीं। लेकिन इस घटना ने दिव्य ज्ञान जरूर दिया है।
बच्चा था। दादा जी अक्सर एक बात कहते थे। आम आदमी सबसे बड़ा गुंडा होता है। बचपन मे उनके कहे को समझ ही नहीं पाया। जवानी मे प्रमाण मिल गया। प्रमाण मिलने के बाद, एक सवाल आया। इतनी ताक़त होने के बाद क्यों लाचार हैं आम लोग। दादा जी जिन्दा नहीं हैं। इस बार जवाब माँ से मिला। सबसे बड़ा गुंडा कभी-कभी ही बोलता है।

1 टिप्पणी:

  1. अजीत भाई, ब्लॉग जगत में स्वागत है। पहली पोस्ट को मैं आत्मालाप कहूंगा। पता नहीं आप क्या कहेंगे..। बेहद कम शब्दों में आपने मन की बात कही है। लेकिन सवाल के लिए गुंजाइश छोड़ दी आपने कि आम आदमी को, जो सबसे बड़ा गुंडा होता है और जब वह बोलता है तो बवाल का ग्राफ कितना ऊंचा होता है..। जरा बताइएगा।

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