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रविवार, 30 मई 2010

केवल माँ

हंसती होगी, रोती होगी, हंसती होगी मां
रात को घर के किस कमरे में जलती होगी मां

बाप का मरना मेरे लिये जब इतना भारी है
उस के बिना तो रोज़ ही जीती मरती होगी मां

बाबुजी घोड़ी पर चढ़ कर घर आते होंगे
अपनी याद में दुल्हन जैसी सजती होगी मां

पानी का नलका खोला तो आंसू बह निकले
गहरे कुएं से पानी कैसे भरती होगी मां

मेरी ख़ातिर अब भी चांद बनाती होगी ना
जब भी तवे पर घर की रोटी पकती होगी मां

अपनी आंख का नूर तो वह बस मुझ को कहती थी
मेरी भेजी चिट्ठी कैसे पढ़ती होगी मां

मेरी लम्बी उम्र की अर्ज़ी होठो पे ले कर
मंदिर के सब जीने कैसे चढ़ती होगी मां
( पंक्तिया अपनी नहीं है. साभार ली गयी है, दिल को छू गया। मजबूरन ब्लॉग पर डालना पड़ा.)

3 टिप्‍पणियां:

  1. केवल माँ माँ माँ माँ और क्या कहूँ बस माँ माँ
    रत्नेश त्रिपाठी

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  2. बहुत सुंदर भाव

    मेरी लम्बी उम्र की अर्ज़ी होठो पे ले कर
    मंदिर के सब जीने कैसे चढ़ती होगी मां

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  3. जिसकी भी पंक्तियाँ हों, हैं बहुत भावपूर्ण!

    उत्तर देंहटाएं