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बुधवार, 16 जून 2010

तन्हाई

तन्हाई ने एक दिन
मुझसे चुपके से यूं कहा,
दिल तुम्हारा आजकल
ऐसे क्यों धडक रहा ?
अपनी धडकनों से तुम कुछ क्यों नहीं कहते,
हंसी-खुशी वो चुपचाप शान्त क्यों नहीं रहते ?
मैं तो अब भी हूँ तुम्हारे साथ
यूँ ही कसकर थामे रखो मेरा हाथ ।

मैं मंद-मंद मुसकाया
आँखें मुंदकर इशारों में ही ये जताया,
सुनी है,
मैंने भी धडकनों की बात,
खफ़ा हैं वे तुमसे आज रात ।
जशन की रात भी तुम देरी से आते हो
उस पर बहाने पे बहाने बनाए जाते हो ।

पता है,
हमें भी मौसम का मिज़ाज़ खुब,
तुम भी धीरे-धीरे बदल रहे हो अपना रंग-रूप।
सुना है,
तुम्हारे दोस्तों की ज़मात भी बढती ही जा रही
उस फ़हरिस्त में हमारी यारी नीचे ही फिसलती आ रही ।

याद है,
जब शहर में तुम नए-नए थे
एक छत की तलाश में
दिन-भर फिरते रहते थे
थोडा़ हैरान, कुछ परेशान ।
अपने अच्छे-बुरे कई दोस्तों की बातों को अनसुनी कर
बुलावा दिया था तुम्हें एक शाम अपने घर पर।

उस शाम,
अपनी कहानी कहते-कहते ही सो गए थे तुम
अंधेरे में देख ना पाया
कि रात भर इतने रोए थे तुम ।
बात सुबह समझ में आई
जब पाया, की तकिया तब भी गीला पडा़ था ।
हाथ बढा़कर मैंने कहा था
मेरे कमरे में ही क्यों नहीं रह जाते ।
लिखते-पढते,
सुनते-सुनाते,
नए-पुराने कुछ गीत गुनगुनाते
कट जाएगी ज़िन्दगी यूं ही दिन-रात ।

वैसे भी,
मैं भीड़-भाड़, शोर-शराबे से दूर रहता हूँ
अक्सर पार्टीयों में भी बडा़ बोर होता हूँ
सच्ची-सच्ची कहना
क्या तुम दोगे मेरा साथ ?
तो कसकर थाम लूँ मैं आज ही तुम्हारा हाथ ।

एक वो दिन था
और एक आज का दिन है ,
अब तुम स्वार्थी हो गए हो
कुछ को रुलाते हो
कुछ को सताते हो ।
अपने दोस्तों को समझाते क्यों नहीं
तुमसे दोस्ती सबकी फितरत में नहीं ।

और तुम भी
बंगला-गाडी़ के चक्कर में मत पड़ना
खुशी अगर वहाँ होती
तो तुम्हें फिर क्यों कहते लोग अपना ।
अब बस लौट आओ,
आखिरी कुछ सांसों में तो दोगे तुम मेरा साथ,
तुम्हारे संग
शायद यही हो जशन की आखिरी आज रात ।

( साभार ली गयी पंक्तिया हैं। जब आप अपने घर से दूर शहर पहुंचे होंगे, तो ऐसी कई रात गुजरी होंगे। ये पंक्तिया आपको उन रातों की याद दिला देंगी)

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