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गुरुवार, 17 जून 2010

सवाल

आजकल किस रौ में जीए जाते हो,
हर सवाल का जवाब ‘शायद’ ही ‘शायद’ कहे जाते हो
शब्दों की मुफलीसी के शिकार तो ना थे तुम,
या किसी के उल्फत में हो गए हो गुमसुम ।
रोजी रोटी की कशिश
रिश्तों में नहीं है अब वो तपिश
दुनिया से यूं ही कुछ खलिश
या जीने का कोई फलसफा ही नहीं ?
शायद हाँ
शायद नहीं
शायद पता नहीं
शायद सोचा ही नहीं।

बचपन का एक पुराना यार मिला,
बस सवालों का सिलसिला चल पडा ।
वो डाक्टर बन गया है
और मैं पत्रकार ।
एक अरसे बाद मिल बैठे हम यार
दिल खोलकार कुछ बातें हुई चार।
ज़िन्दगी ने दोनों को बडा़ बदल दिया था
बस तनिक बातें, एक सी कर गया था ।

कौन, कैसे, किसका, कहाँ, क्यों और कब,
इन्हीं सवालों का जवाब ढूँढ रहे थे हम अब ।
वो भी,
और मैं भी ।
वो अस्पताल मे, मरीजों के संग
मैं बाहर, देख रहा था सर्कस का हर रंग ।
उसके सवाल कुछ ज़िन्दगी जरूर बदल रहे थे
मेरे, बस कुछ बदलने का ढोंग रच रहे थे ।

हर रोज़, सुबह शाम
दिन बितता है, बस सवालो के नाम
कुछ रंग-बिरंगे, कुछ श्वेत-श्याम
कुछ सीधे-साधे, कुछ टेढे-मेढे
कुछ सहमे-सहमे
विडम्बना ये की सब बिके हुए,
बडे सस्ते से।
चलते-चलते मैंने उसकी ओर
और उसने मेरी ओर देखा
एक दूजे के कई अनसुलझे सवालों को पढा
और सोचा
क्या ज़मीर अब दुनिया से यूं ही नदारद रह जाएगी ?
कब तक ?

( साभार ली गयी पंक्तिया)

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