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शुक्रवार, 25 जून 2010

मिटटी का तेल

बहुत तपस्या करने पर,
१००० अगरबत्ती जलाने पर,
हनुमानजी प्रसन्न हुए,
बोले,"वत्स, क्यों मुझे याद किए" |

मैंने कहा,"अहो भाग्य हमारे,
हनुमानजी घर पधारे,
इस धरा पर मैं हूँ आपका परम भक्त,
किन्तु हूँ दुविधा में इस वक़्त,
हो सके तो मेरा बेडा पार कीजिए,
कण्ट्रोल रेट पर २ गेलन मिट्टी का तेल ला दीजिए |"

यह सुनकर हनुमानजी बोले,
"तू हनुमान का भक्त हैं,
किसी ऐरे-गैरे का नहीं,
माँगना हैं तो कुछ बड़ा मांग,
यह मिट्टी का तेल नहीं |"

मैंने कहा,"लाना है तो,
मिट्टी का तेल लाइए,
बिना मतलब की
बातें न बनाइए,
यदि नहीं ला सकते,
तो १००० बतियाँ, २०० नारियल और २५ सेब
वापस कीजिए |"

सुनकर वह बोले, "जाता हूँ,
अभी लेकर आता हूँ |"
इस बात को तीन वर्ष बीत गए,
हनुमानजी अब तक नहीं लौटे |

कल समाचारपत्र में पढ़ा था,
एक और खून हुआ था,
जाति की अग्नि में,
एक और अबला का दहन हुआ था,
पढ़ते-पढ़ते एक सवाल उठ रहा था,
गर हनुमानजी को मिट्टी का तेल नहीं मिला,
तो सीता के जलाने वालो को कहाँ से मिला,
सीता के जलाने वालो को कहाँ से मिला ...
( मिटटी तेल की कीमत बढ़ गयी है, रावन फ्लॉप हो गयी है। ओनर किलिंग जोरो पर है. ऐसे में
चेतन भादरीचा की ये कविता काफी कुछ कहती है)

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