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शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

तमाशा अभी बाकीं है मैडम शीला ...

गुरुवार की रात थी। कर्नाटक संकट के अपडेट से निपटा था। पानी की दो बूँद मुख के अन्दर गई ही थी कि टीवी की आवाज कानों में गूंजी। खबर थी "अब हम ओलंपिक की मेजबानी के लिए तैयार हैं"। पानी गले के अन्दर नहीं उतरा, बाहर आ गिरा। कुछ मिनटों तक खांसी होती रही। शायद यह खबर जिस किसी ने सुनी होगी, उसके गले से नहीं उतरी होगी! तब से ही सोच रहा हूँ कलमाडी और शीला किस मिट्टी के बने हैं। राष्ट्रमंडल खेल के भव्य आगाज और भारतीय खिलाड़ियों के स्वर्णिम प्रदर्शन से इन्हें लूटने का एक और मौका पा लेने की प्रेरणा कैसे मिली
पहले बात कलमाडी की। पवार साहब के स्कूल से निकले इस होनहार छात्र के क्या कहने। भाई साहब, बड़े गुरूघंटाल हैं। खेल के नाम पर कैसा खेल किया यह लोगों को अब तक याद है। कलमाडी स्कूल ऑफ़ लर्निंग से निकले लोगों के हैडमास्टर हैं " सुरेश कलमाडी" दिल्ली आने से पहले झारखण्ड में इनके चेलों का खेल देख चुका हूँ। ईमानदारी से कहूं तो वहां खेल के नाम पर जो लूट चल रही है उसके पैसे से सुख भोगने का मौका कई दफा इस नाचीज को भी मिल चुका है। इसलिए कलमाडी से ऐसी ही उम्मीद थी, थोड़ी भी हैरानी नहीं है।
हैरान हूँ शीला को लेकर। मोहतरमा 98 से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। जनता के प्रति सीधी जवाबदेह हैं। लेकिन, मैडम चंद दिनों में ही सब कुछ भूल गई। भूल गई खुदी और गन्दी दिल्ली। ऐसी राजधानी जहां जिंदगी रोज मुश्किल होती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर जो गंध इनकी अगुवाई मे मची, उसे कोई कैसे भव्य आगाज से भूल सकता है। अपन सोच रहे थे, मैडम को नींद नहीं आती होगी। पर मैडम तो ओलंपिक के नाम प़र लूट का नया मौका तलाश रही हैं।
सड़कों पर जाम दिल्ली के लिए नई नहीं है। आपने एक लेन खेल को समर्पित कर समस्या और बढ़ा दी। सरकार के पास बस नहीं थी, ब्लू लाइन बंद कर दिया। लोग घंटो स्टॉप पर खड़े रहने को मजबूर हैं। आपके सितम की लम्बी फेहरिस्त है। फिर भी जनता चुप है। इसलिए की हमारे संस्कार हमें "अतिथि देवो भव" बचपन से ही सीखाते हैं. खेल के बाद आपसे हिसाब मांगेगी ये जनता. कलमाडी तो बच भी निकलेंगे, आप कहाँ जाएँगी. बताना होगा आपको इस खेल की सजा हमें कब तक भुगतनी होगी। आपके कर्मो का हिसाब चुनावी मैदान मे नहीं होना है। ये आप भी जानती है कि अगले चुनाव का परिणाम कुछ भी आये, ये आपकी लास्ट इनिंग है क्या खेल के नाम पर हर रोज परेशान रहने वाली जनता की आहें आपको जीवन के शेष काल सुकून से काटने देगी। उमाशंकर जी की पुत्रवधू होने के कारण उम्मीद करता हूँ, आपकी अंतरात्मा जीवित होगी। अभी भी मौका है। दुर्गापूजा का वक़्त है, माते। ओलंपिक का ख्वाब देखना बंद करिए। ऐलान कर दीजिए एक जंग का। उन्हें सजा दिलाने का जिनने राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर कोई और ही खेल खेला है। यकीन मानिए उस दिन आवाज आएगी " शीला जी तुम ओलंपिक लाओ, हम तुम्हारे साथ हैं"। तब आप मुख्यमंत्री हों या न हों, कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्यूंकि तब कोई कलमाडी नहीं होगा, जो आगाज के वक़्त एक पूर्व राष्ट्रपति का नाम भी सही-सही नहीं ले सकता। तब पानी नहीं सरकेगा। आपका बयान सुन किसी को हंसी नहीं आएगी, कोई खंसेगा नहीं। कीबोर्ड टिप-टिप करने लगेंगे। आपकी कट आउट लगेगी, देर रात पेज का ले आउट बदला जाएगा...

5 टिप्‍पणियां:

  1. अरे भाई! कोई भरोसा नही है शीला जी का। फिर चुमाव जीत कर यही कांग्रेस आ जाये। क्योकि हमारे दॆश की जनता बहुत महान है। हो सकता है ये सपना भी शीला जी का पूरा हो जाये। :))

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  2. bahut hi nayab andaz men baat kahi, antar yah hai ki sheela madam bhi hairaan aur pareshan hongi ki aisa salahkaar pahle kyon nahin mila...shayd ab pata chalte hi aapko vo dinner pe bulaye....aur aapse agale chunav aur olumpic ki ranniti banvaye....

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  3. यह मानना गलत नहीं है कि इस राष्ट्रमंडल खेलों में दिल्ली की जनता को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है पर २०२० में अभी भी १० साल हैं...
    जनता की मांग यही है कि कलमाड़ी पर जल्द-स-जल्द कार्यवाही की जाए और फिर नए सिरे से ओलम्पिक के लिए तैयारी की जाए.. ताकि राष्ट्रमंडल खेलों की तरह ज़लील न होना पड़े...

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  4. करीबन अद्भुत... इसके अलावा कुछ नहीं कहूँगा... बहुत कहा जा चुका, अब किया जाये..

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