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रविवार, 10 अक्तूबर 2010

बीपीएल में तेजस्वी यादव


बिहार में इन दिनों बीपीएल (बिहार पोलिटिकल लीग) जोरों पर हैं। कविता और छंदों से शुरू हुई इस लड़ाई में एक मासूम चेहरा भी खूब सुर्खियाँ बटोर रहा है और वे हैं तेजस्वी यादव। तेजस्वी पूर्व रेल मंत्री लालू यादव के बेटे हैं। मैं तेजस्वी से पहली बार 2005 में मिला था। होली का दिन था और राबड़ी देवी के सरकारी आवास पर दरबार लगा था। मासूम से तेजस्वी उस समय दूर से ही लालू के फेमस होली का मजा ले रहे थे। एक सामान्य लड़के की तरह। उनसे बातचीत में कभी लगा ही नहीं कभी यह बच्चा चुनावी मैदान में दिखेगा। वे अपने पिता के भदेश अंदाज से भी ज्यादा प्रभावित नहीं दिखे। उनके लिए भी यह अंदाज़ हँसने का महज बहाना था। इस तेजस्वी को जब करीब पांच साल बाद टीवी पर देखा तो, सोच में पड़ गया। (दुखद, इस बार के चुनाव में अपना वोट डालने गाँव भी नहीं जा पा रहा हूँ।)
अब फिर बात तेजस्वी के नए रूप की. नितीश चाचा को टक्कर देने की बात करते तेजस्वी। अपनी माँ को जीताने की अपील करते तेजस्वी। आखिर, कैसे बदल गए तेजस्वी। लम्बे समय से मिला नहीं हूँ, इसलिए इसका जवाब मुझे भी नहीं पता। लेकिन, यह सत्ता से दूर लालू की वेदना का जरूर परिचायक है। तेजस्वी के आगमन के साथ बिहार में एक नए समाजवाद का उदय हुआ है एक ऐसा समाजवादी जिसे राजनीतिक जमीं संघर्ष से नहीं मिला है। थाली में परोस के पेश किया गया है। बिल्कुल, उसी अंदाज में जैसे बगल के यूपी में मुलायम से समाजवाद अखिलेश तक पहुंचा हैं। हालाँकि, तेजस्वी अभी चुनाव नहीं लड़ रहे। उनकी उम्र उनका साथ नहीं दे रही। लालू खुद भी इसका ऐलान कर चुके हैं। वैसे लालू अब अतीत से सीखते दिख रहे हैं, नहीं तो सोनपुर से राबड़ी की जगह अबकी बार ही तेजस्वी मां के बदले अपने लिए वोट मांग रहे होते। जिन्हें याद नहीं हो उन्हें बता दूं की लालू सम्राट चौधरी को उम्र नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाने का कारनामा कर चुके हैं। इस बार उन्होंने ऐसी गलती नहीं की, धन्यवाद लालू जी
फिर लौटते हैं तेजस्वी के लौंचिंग पर। लालू के राजनीतिक वारिश बनने के दौड़ में कभी नहीं थे तेजस्वी। न खुद तेजस्वी की ऐसी कोई ख्वाहिश थी। वे क्रिकेट में नाम कमाना चाहते हैं। पर राजनीति जो ना कराए। मीसा का नाम कई बार वारिश के रूप में लिया गया। एकाध बार उनके पति का भी नाम आया। लेकिन, इनके दावे जितनी तेजी से आए उतनी तेजी से ही टूट गए। हालाँकि, पटना के कुछ पत्रकार मित्र बताते हैं कि एक बार मीसा के नाम पर लालू काफी गंभीर थे। पर साधू और सुभाष के कारनामे ने लालू को कदम पीछे खीचने को मजबूर कर दिया। साले के मारे लालू बेटी-दामाद के साथ प्रयोग करने का साहस नहीं जुटा पाए और तेजस्वी आ गए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि लालू आज भी बिहार में ताक़त हैं। उनके दम पर तेजस्वी एकाध बार चुनावी वैतरणी भी पार कर सकते हैं। लेकिन, बिहार कि राजनीतिक जमीं पर तेजस्वी जैसों के लिए ज्यादा स्कोप नहीं हैं। बेहतर होता तेजस्वी को अपने मन की करने देते लालू। बिना लालू की ट्रेनिंग के वे अपना दम दिखा सकते हैं (कहीं और)। तेजस्वी, साधू भी नहीं बन सकते, क्यूंकि मामा-भांजे का संस्कार अलग है ऐसे में राजनीतिक मैदान में बोलते-बोलते अटकते तेजस्वी का दर्द लालू क्यूँ नहीं महसूस नहीं कर पा रहे हैं?
क्या, राजनीति वाकई ऐसी हो गई है कि एक पिता अपने फायदे के लिए बेटे कि मासूमीयत छीन सकता हैंमाना तेजस्वी के पास अब सगे शकुनी मामा नहीं रहे, लेकिन जबरदस्ती के कई शकुनी और कर्ण उनके पास मंडरा रहे हैंये कर्ण दानवीर नहीं, लूटने वाले हैंउसपर पितामह और गुरु द्रोण भी नहीं हैंऐसे में कही एक तेज समय से पहले ही भोथरा हो जाएदुर्भाग्य, कृष्ण भी नहीं हैंवैसे, इस महाभारत में तो कभी खुद को कृष्ण बताने वाले लालू फ़िलहाल ध्रित्यराष्ट्र बन चुके हैं
देखिए आगे-आगे होता है क्याअभी अगली होली का इंतजार है, उम्मीद करता हूँ एक बार फिर तेजस्वी
से मुलाकात होगी...

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