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रविवार, 30 मई 2010

केवल माँ

हंसती होगी, रोती होगी, हंसती होगी मां
रात को घर के किस कमरे में जलती होगी मां

बाप का मरना मेरे लिये जब इतना भारी है
उस के बिना तो रोज़ ही जीती मरती होगी मां

बाबुजी घोड़ी पर चढ़ कर घर आते होंगे
अपनी याद में दुल्हन जैसी सजती होगी मां

पानी का नलका खोला तो आंसू बह निकले
गहरे कुएं से पानी कैसे भरती होगी मां

मेरी ख़ातिर अब भी चांद बनाती होगी ना
जब भी तवे पर घर की रोटी पकती होगी मां

अपनी आंख का नूर तो वह बस मुझ को कहती थी
मेरी भेजी चिट्ठी कैसे पढ़ती होगी मां

मेरी लम्बी उम्र की अर्ज़ी होठो पे ले कर
मंदिर के सब जीने कैसे चढ़ती होगी मां
( पंक्तिया अपनी नहीं है. साभार ली गयी है, दिल को छू गया। मजबूरन ब्लॉग पर डालना पड़ा.)

मंगलवार, 25 मई 2010

खबर जो खबर नहीं है

खबरों की भी अपनी दुनिया है। सबसे अलग। अनोखी दुनिया। सबको अपने मे समाने की जल्दी। उतनी ही जल्दी निकाल फेकने की भी। अक्सर सोचता हूँ। ऐसी क्यू हैं खबरों की दुनिया। आपस में लड़ती खबरे। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़। हर रोज यही खेल खेलती हैं खबरे। सुबह की ब्रेकिंग न्यूज़ दिन बीतते-बीतते निढाल हो जाती हैं। फिर भी कोई शोर नहीं। ना तो आगे निकलने की ख़ुशी। ना ही पीछे छूटने पर क्रंदन। हर हार के बाद नए सिरे से लड़ती हैं। आगे निकलने का जूनून लिए। पिटती-पिटाती कभी जीत जाती हैं। अक्सर हारती भी हैं। लेकिन, लब हमेशा खामोश रखती हैं। खबरे। अपना दर्द किसी से नहीं बतियाती हैं। अपने राज बेपर्दा नहीं करती। जितनी जगह मिल जाये उतने से ही खुश। साथी को ज्यादा जगह मिल जाने का नहीं कोई गम। जगह नहीं मिले तो भी कोई गल नहीं। चुपके से। फुसफुसा कर, केवल इतना कह जाती हैं। फिर लौटूंगी। इंतजार करना। भूलना मत। मैं लौटती रही हूँ। हमेशा से। नए रूप में। वैसे तुम भी तो यही करते हो। दूसरे से अलग दिखाने के फेर मैं। टिप-टिप कर के मेरा रंग रोगन करते हो। कहते हो मौलिक काम किया। लेकिन, मौलिक कुछ भी नहीं होता। मनु भी मौलिक नहीं थे। तो फिर मेरी और तुम्हारी बिसात किया। कुरुषेत्र से कलयुग तक। सतयुग से सौन्दर्य तक। कुछ भी नहीं हैं मौलिक। ना जाने। ऐसी कितनी। बाते कहती हैं। खबरे हर रोज। खामोश लब से। हम कुछ समझते हैं। या समझने की नौटंकी करते हैं। हम ही जाने। पर खबर को तामश नहीं आता। हमारी नादानी पर हंसती भी नहीं। अपने दर्शन का बखान भी नहीं करती। नहीं कहती है बुरबक। फिर कोशिश करती हैं। करती रहती है। बार-बार। कोशिश। समझने। समझाने की। हमारे हिसाब से बदलती हैं। अपने हिसाब से नहीं ढालती. हमारी ख़ुशी के लिए। शायद गीता को सबसे बढ़िया समझती हैं। खबरे। या फिर ख़बरों के दर्शन ने कृष्ण को मजबूर किया। कहने को " कर्म कर-फल की चिंता म़त कर"।

शनिवार, 8 मई 2010

कभी-कभी ही बोलता है बड़ा गुंडा

आम आदमी। अक्सर खामोश रहता है। बोलने से बचना चाहता है। हमेशा कोशिश करता है नहीं बोलने का। सियासतदा उसे मजबूर करते है। बोलने के लिए। फिर भी वह चुप रहता है। खामोश। लेकिन, जब यह आम आदमी बोलता है तो खूब बोलता है। नेपाल इसका गवाह है। आम लोगो की यही ताक़त माओवादियो को खामोश कर देती है। ये वो माओवादी हैं जिनसे सरकार भी डरती है। इनके नेता बडबोले हैं। कार्यकर्त्ता आक्रामक। पर जब जनता बोली तो बडबोलापन और आक्रामकता हवा हो गयी। पर सवाल बरक़रार हैं। बोलने के बाद, अपनी ताक़त का एहसास करने के बाद, क्यों चुप हो जाती है जनता? पता नहीं। लेकिन इस घटना ने दिव्य ज्ञान जरूर दिया है।
बच्चा था। दादा जी अक्सर एक बात कहते थे। आम आदमी सबसे बड़ा गुंडा होता है। बचपन मे उनके कहे को समझ ही नहीं पाया। जवानी मे प्रमाण मिल गया। प्रमाण मिलने के बाद, एक सवाल आया। इतनी ताक़त होने के बाद क्यों लाचार हैं आम लोग। दादा जी जिन्दा नहीं हैं। इस बार जवाब माँ से मिला। सबसे बड़ा गुंडा कभी-कभी ही बोलता है।