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शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

यक्ष प्रश्न


जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।

सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।

प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।

(ये पंक्तिया पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हैं। मुझे नहीं पता राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान क्यों अक्सर उनकी याद आती थी...)

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

अथ श्री भारत कथा


(गुरुवार को राष्ट्रमंडल खेलों का समापन हो गया अब अगले कुछ दिनों तक हम भारत की बात करेंगे उस भारत की जो हमारी आत्मा है जानेंगे भारत और इंडिया के द्वन्द को आज बात उस भारत की जिसने इंडिया के आयोजन को शानदार बनाया और हमें कुछ दिनों के लिए स्याह दुनिया को भूलने के लिए मजबूर कर दिया...)
एक सप्ताह पहले तक आशीष कुमार का नाम उनके शहर इलाहाबाद में भी अंजाना था। आज पूरे भारत को उनपर गर्व है। आशीष से पहले हमने कभी सोचा भी नहीं था कि जिम्नास्टिक में कोई पदक मिलेगा। 19 साल के आशीष के कारनामे से पहेले हम मजबूर थे आंख फाड़ कर विदेशियों को देखने और उनके शारीर के लचक पर ताली बजाने के लिए। 16 साल कि दीपिका झारखण्ड के चितपुर गाँव से आती हैं। पिता ऑटो चलते हैं। राजनैतिक उठापटक और धोनी के लिए मशहूर इस राज्य की नई पहचान हैं दीपिका। अंतिम दौर में परफेक्ट टेन का स्कोर ऐसे ही नहीं बनता। असली भारत हमें कदम-कदम पर अचूकता सिखाती है। दीपिका ने जिंदगी से जो सीखा उसे मैदान पर उतारकर हमारे लिए खुशियाँ चुरा लाती हैं। इस खेल ने कई और हीरो दिए, उनमे राहुल बनर्जी भी एक हैं।
जिस देश में क्रिकेट धर्म हो और उसके खिलाडी भगवान। जहा सफलता इंडिया की बपौती मानी जाती है। जहां भारत का मतलब लाचारी और बेबसी से हों, वहां छोटे-छोटे गांव और कस्बों से निकले इन सितारों नेसाडी परिभाषा ही बदल दी है। जब लॉन टेनिस में भूपति, पेस और सानिया जैसे इंडियन हमें निराश कर देते हैं तो भारत का एक बेटा आता है "सोमदेव वर्मन"। आरके खन्ना स्टेडियम में सबके चेहरे पर गर्व लाता हैं और आँखों में ख़ुशी के आसूं। ये दूसरी बात है कि सोना साधने के बाद भी उसके चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान ही दीखता है। ये मासूमियत भारत हमें सिखाता है, इसे इंडिया में हम अक्सर मिस करते हैं। बोक्सिंग में अखिल और विजेंदर जब निराशा के अंधकार में हमें छोड़ जाते हैं तो मनोज, सुरंजोय, समोटा आते हैं। दस दिन पहले तक हम इनका नाम नहीं जानते थे, आज ये हमारे हीरो हैं। छोटे- छोटे गावों से आये हैं। बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर पेश करने वालों की ये फेहरिस्त लम्बी है। गीता, योगेश्वर, अलका, सरथ कमल, रमेश कुमार, कृष्ण पुनिया, रवि कुमार, विजय कुमार, नरसिंह यादव, ओमकार सिंह, रेनू बाला, अनीसा, अनीता, हिना... खेल से पहले अलग कारणों से सुर्खिया बटोरने वाली ज्वाला जब अश्वनी के साथ मैदान पर आती हैं तो हमें विपरीत हालत से लड़ना सिखाती हैं। बचपन से कदम-कदम पर भारत हमें यही तो सिखाता है।
जारी....

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

मगर शर्म इन्हें आती नहीं

आज राजनीति के मैदान से दो बड़ी ख़बरें आई हैं। कर्नाटक के नाटक पर फ़िलहाल विराम लग गया है। भाजपा की सरकार ने चार दिनों के भीतर दूसरी बार विश्वास म़त हासिल किया। दूसरी ओर, महराष्ट्र में कांग्रेस का खेल बेनकाब हुआ है। कैसे, सोनिया की रैलियों में भीड़ जुटाई जाती है वह कैमरे पर आ चुका है।
बात पहले कर्नाटक की। भाजपा को इतने वोट मिले हैं कि यदि निर्दलियों को वोट डालने का अधिकार कोर्ट दे भी दे तो सरकार बची रहेगी। अब इस पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया देखिए। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि ये सरकार बाहुबल और पैसे के ताक़त पर बचाई गई है। सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया गया है। यदि इस बात मे दम है भी तो कांग्रेस राज्य सरकार को गिराने के लिए इतनी बेचैन क्यूँ हैं, समझ में नहीं आ रहा? कल तक इसी पार्टी का कहना था कि भाजपा के पास बहुमत लायक विधायक ही नहीं हैं। जो चमत्कार पैसे और बाहुबल से पार्टी पिछले सात दिनों में नहीं कर पाई, उसे आखिर अंतिम चौबीस घंटे में कैसे कर दिया गया। वैसे भी बंगलुरू में बैठकर हंसराज भारद्वाज संविधान का भला करने के बदले कांग्रेस का ही तो एजेंडा चलाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। इतना ही नहीं इस नाटक के शुरू होने से पहले रेड्डी बंधुओं के पीछे लगी कांग्रेस अचानक ही उनको लेकर मौन हो गई। मैं रेड्डी बंधुओं का बचाव नहीं कर रहा। उन्हें सजा मिलनी चाहिए, कानून सम्मत। लेकिन, नफा-नुकसान का आकलन कर रेड्डी बंधुओं से कभी प्यार और कभी दुत्कार कांग्रेस का असली पोलीटिकल चेहरा दिखाता है। वैसे भी कर्नाटक में जैसा चल रहा है ऐसा ही चलता रहा तो भाजपा की कब्र ही खुदनी बाकी रह गई है. जल्दबाजी दिखा कर कांग्रेस और कुमारस्वामी उसे संजीवनी ही दे रहे हैं.
अब बात महाराष्ट्र की. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री ने वर्धा में सोनिया की होने वाली रैली को लेकर कुछ खुलासा किया है.किसी चैनेल ने स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया। गलती से इनकी बाते कैमरे में कैद हो गई। दरअसल पार्टी का प्रेस कांफ्रेंस हो रहा था। दोनों नेताओं को पता नहीं था की कैमरा ऑन है। अब जरा इनकी बात सुनिए...अशोक चौहान(मुख्यमंत्री) ने दो हजार बसों के लिए दो करोड़ दे दिए हैं... इन बसों में लोगों को भरकर लाना है... आखिर गलती से ही सही यह सार्वजनिक हो ही गया कि मैडम सोनिया और और युवराज राहुल की रैलियों में भीड़ कैसे जुटती है। अब तो लगता है कि राहुल की यात्राओं के दौरान होने वाली नौटंकिया भी कही फिक्स ही तो नहीं होती।
वैसे भी अपने देश में कुछ भी हो सकता है। आखिर पता भी तो नहीं चलता कि नत्था मरेगा या बचेगा. लाल बहादुर मिलने के बावजूद। अब अपने कलमाडी साहब को ही देखिए। जनाब भी गलती से कांग्रेसी ही हैं। कॉमनवेल्थ खेल के आयोजन समिति के अध्यक्ष भी हैं। आज इस खेल का समापन हो रहा है। समिति की तरफ से अख़बारों में एड दिया गया है। भगवान भरोसे सफल हुए आयोजन से लेकर खिलाडियों के स्वर्णिम प्रदर्शन तक का श्रेय समिति ने लूट लिया है। वैसे भी कलमाडी से नैतिक साहस की कभी भी उम्मीद नहीं रही है। भाई साहब खुद लाल बहादुर जो हैं! सिर्फ इसी बात की ख़ुशी है कि समिति ने सयाना से लेकर सुशील तक हर किसी को कोचिंग देने का श्रेय नहीं लिया। बच गए पुलेला गोपीचंद से लेकर सतपाल तक। एक और मजेदार बात कांग्रेसी प्रधानमंत्री हॉकी देखने पहुंचे और ऑस्ट्रेलिया ने भारत को धो डाला। हा हा हा...गनीमत है नेहवाल का मैच देखना मनमोहन भूल गए. फ़िलहाल रैंकिंग में नंबर दो रहने का जश्न मनाइए, हमारे राजनेता तो ऐसे ही हैं.

बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

आनंद ही आनंद


बचपन से अबतक पता नहीं कितनी बार "आनंद" देखी है। मंगलवार की देर रात एक बार फिर इस फिल्म को देखा। पता नहीं क्यूँ तबसे ही राजेश खन्ना मुझे हर भारतीय खिलाडी में नजर आ रहे हैं। फर्क केवल इतना है कि फिल्म में आनंद सहगल कैंसर की बीमारी से लड़ रहा था और हमारे खिलाडी घटिया सिस्टम के कैंसर से लड़ रहे हैं। मौत से लड़ता आनंद सहगल फिल्म में हर किसी के चेहरे पर अपनी जिन्दादिली से मुस्कान लाता है और हमारे जांबाज मैदान से हमारे लिए मुस्कुराहट ला रहे हैं।
किसने सोचा होगा कलमाडी एंड कंपनी के कुकर्मो के बाद हमें ऐसी जीत नसीब होगी कि थोड़ी देर के लिए हम अपने गम भूल जाएंगे। ऐसा ही है अपना भारत। इसलिए तो हम महान हैं। जब लिएंडर और महेश निराश करते हैं, सान्या का साथ छूटने लगता है एक सोमदेव आता है बाल सुलभ मुस्कान के साथ। वैसी ही हंसी के साथ जैसी फिल्म में बार-बार कई बार आनंद के चेहरे पर दिखता है। झारखण्ड की दीपिका, संकटों की आंधी को चीर कर यहाँ पहुंची है। गगन नारंग, सुशील सब खुद के दम पर बने सितारे हैं। न किसी सरकार ने मदद दी न ही किसी सिस्टम ने इनकी भलाई की। लेकिन, ये मजबूरियों का रोना नहीं रोते। उपलब्ध संसाधनों से इतिहास रचते हैं। फिर भी विनम्र। किसी से कोई शिकायत भी नहीं करते। केवल ख़ामोशी से अपनी नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं। शूटिंग और कुश्ती मे मिले मेडल इसके गवाह हैं। सुशील के गुरु को देखिए। गिल ने अपमान किया, लेकिन अपना गम किसी को नहीं बताते। केवल कुश्ती की सफलता और उसके भविष्य की बात करते हैं। पुलेला गोपीचंद ख़ामोशी से आते हैं और सायना नेहवाल को मंत्र दे कर फिर कोने में दुबक जाते हैं। ना अपनी महानता का गुणगान करते हैं और ना ही इस देश के भ्रष्ट सिस्टम पड़ सवाल खड़ा करते हैं। कृष्णा आती हैं और इतिहास रचकर चली जाती हैं। ओनर किलिंग के लिए कुख्यात हरियाणा की लड़कियां सोने पर सोने बरसा रही हैं। सब चुपके से अपना-अपना काम करती हैं। आम आदमी की खुशी के लिए अपना दर्द छुपा जाती हैं।
सुरेश कलमाडी, शीला ... जब इन्हें मेडल देते हैं डॉक्टर बनर्जी की तरह हंसते हैं। फिल्म मे डॉक्टर बनर्जी को पता था कि आनंद सहगल चंद दिनों का मेहमान है। शायद, यही कारण है की उनकी हंसी में आनंद का दर्द दिखता था। यहाँ कलमाडी, शीला ... यह सोच कर परेशान हैं, ये ऐसा कैसे कर रहे हैं। इनकी हंसी में यही दिखता है। लेकिन, इन्हें शर्म आती नहीं। ये कुछ इनाम की घोषणा कर ही बम-बम हैं। फिल्म में आनंद मुरारीलाल कि तलाश में कई दोस्त बना लेते हैं, यहाँ हमारा सिस्टम बेडा गर्क करने के फेर मे हमें कई सितारे देकर चला जाता है। बाबू मोशाय, आनंद कभी मरता नहीं है... ठीक वैसे ही जीत का जूनून कभी दम तोड़ता नहीं। जैसे मौत एक कविता है, जीत भी एक कविता है...हमसे हमारे खिलाडियों का वादा है हर कदम पर करेंगे कलमाडी और शीला जैसों को शर्मिंदा। लाएंगे हमारे लिए आनंद ही आनंद। केवल आनंद...सुन रहे हैं न बाबू मोशाय.

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

बीपीएल में तेजस्वी यादव


बिहार में इन दिनों बीपीएल (बिहार पोलिटिकल लीग) जोरों पर हैं। कविता और छंदों से शुरू हुई इस लड़ाई में एक मासूम चेहरा भी खूब सुर्खियाँ बटोर रहा है और वे हैं तेजस्वी यादव। तेजस्वी पूर्व रेल मंत्री लालू यादव के बेटे हैं। मैं तेजस्वी से पहली बार 2005 में मिला था। होली का दिन था और राबड़ी देवी के सरकारी आवास पर दरबार लगा था। मासूम से तेजस्वी उस समय दूर से ही लालू के फेमस होली का मजा ले रहे थे। एक सामान्य लड़के की तरह। उनसे बातचीत में कभी लगा ही नहीं कभी यह बच्चा चुनावी मैदान में दिखेगा। वे अपने पिता के भदेश अंदाज से भी ज्यादा प्रभावित नहीं दिखे। उनके लिए भी यह अंदाज़ हँसने का महज बहाना था। इस तेजस्वी को जब करीब पांच साल बाद टीवी पर देखा तो, सोच में पड़ गया। (दुखद, इस बार के चुनाव में अपना वोट डालने गाँव भी नहीं जा पा रहा हूँ।)
अब फिर बात तेजस्वी के नए रूप की. नितीश चाचा को टक्कर देने की बात करते तेजस्वी। अपनी माँ को जीताने की अपील करते तेजस्वी। आखिर, कैसे बदल गए तेजस्वी। लम्बे समय से मिला नहीं हूँ, इसलिए इसका जवाब मुझे भी नहीं पता। लेकिन, यह सत्ता से दूर लालू की वेदना का जरूर परिचायक है। तेजस्वी के आगमन के साथ बिहार में एक नए समाजवाद का उदय हुआ है एक ऐसा समाजवादी जिसे राजनीतिक जमीं संघर्ष से नहीं मिला है। थाली में परोस के पेश किया गया है। बिल्कुल, उसी अंदाज में जैसे बगल के यूपी में मुलायम से समाजवाद अखिलेश तक पहुंचा हैं। हालाँकि, तेजस्वी अभी चुनाव नहीं लड़ रहे। उनकी उम्र उनका साथ नहीं दे रही। लालू खुद भी इसका ऐलान कर चुके हैं। वैसे लालू अब अतीत से सीखते दिख रहे हैं, नहीं तो सोनपुर से राबड़ी की जगह अबकी बार ही तेजस्वी मां के बदले अपने लिए वोट मांग रहे होते। जिन्हें याद नहीं हो उन्हें बता दूं की लालू सम्राट चौधरी को उम्र नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाने का कारनामा कर चुके हैं। इस बार उन्होंने ऐसी गलती नहीं की, धन्यवाद लालू जी
फिर लौटते हैं तेजस्वी के लौंचिंग पर। लालू के राजनीतिक वारिश बनने के दौड़ में कभी नहीं थे तेजस्वी। न खुद तेजस्वी की ऐसी कोई ख्वाहिश थी। वे क्रिकेट में नाम कमाना चाहते हैं। पर राजनीति जो ना कराए। मीसा का नाम कई बार वारिश के रूप में लिया गया। एकाध बार उनके पति का भी नाम आया। लेकिन, इनके दावे जितनी तेजी से आए उतनी तेजी से ही टूट गए। हालाँकि, पटना के कुछ पत्रकार मित्र बताते हैं कि एक बार मीसा के नाम पर लालू काफी गंभीर थे। पर साधू और सुभाष के कारनामे ने लालू को कदम पीछे खीचने को मजबूर कर दिया। साले के मारे लालू बेटी-दामाद के साथ प्रयोग करने का साहस नहीं जुटा पाए और तेजस्वी आ गए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि लालू आज भी बिहार में ताक़त हैं। उनके दम पर तेजस्वी एकाध बार चुनावी वैतरणी भी पार कर सकते हैं। लेकिन, बिहार कि राजनीतिक जमीं पर तेजस्वी जैसों के लिए ज्यादा स्कोप नहीं हैं। बेहतर होता तेजस्वी को अपने मन की करने देते लालू। बिना लालू की ट्रेनिंग के वे अपना दम दिखा सकते हैं (कहीं और)। तेजस्वी, साधू भी नहीं बन सकते, क्यूंकि मामा-भांजे का संस्कार अलग है ऐसे में राजनीतिक मैदान में बोलते-बोलते अटकते तेजस्वी का दर्द लालू क्यूँ नहीं महसूस नहीं कर पा रहे हैं?
क्या, राजनीति वाकई ऐसी हो गई है कि एक पिता अपने फायदे के लिए बेटे कि मासूमीयत छीन सकता हैंमाना तेजस्वी के पास अब सगे शकुनी मामा नहीं रहे, लेकिन जबरदस्ती के कई शकुनी और कर्ण उनके पास मंडरा रहे हैंये कर्ण दानवीर नहीं, लूटने वाले हैंउसपर पितामह और गुरु द्रोण भी नहीं हैंऐसे में कही एक तेज समय से पहले ही भोथरा हो जाएदुर्भाग्य, कृष्ण भी नहीं हैंवैसे, इस महाभारत में तो कभी खुद को कृष्ण बताने वाले लालू फ़िलहाल ध्रित्यराष्ट्र बन चुके हैं
देखिए आगे-आगे होता है क्याअभी अगली होली का इंतजार है, उम्मीद करता हूँ एक बार फिर तेजस्वी
से मुलाकात होगी...

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

तमाशा अभी बाकीं है मैडम शीला ...

गुरुवार की रात थी। कर्नाटक संकट के अपडेट से निपटा था। पानी की दो बूँद मुख के अन्दर गई ही थी कि टीवी की आवाज कानों में गूंजी। खबर थी "अब हम ओलंपिक की मेजबानी के लिए तैयार हैं"। पानी गले के अन्दर नहीं उतरा, बाहर आ गिरा। कुछ मिनटों तक खांसी होती रही। शायद यह खबर जिस किसी ने सुनी होगी, उसके गले से नहीं उतरी होगी! तब से ही सोच रहा हूँ कलमाडी और शीला किस मिट्टी के बने हैं। राष्ट्रमंडल खेल के भव्य आगाज और भारतीय खिलाड़ियों के स्वर्णिम प्रदर्शन से इन्हें लूटने का एक और मौका पा लेने की प्रेरणा कैसे मिली
पहले बात कलमाडी की। पवार साहब के स्कूल से निकले इस होनहार छात्र के क्या कहने। भाई साहब, बड़े गुरूघंटाल हैं। खेल के नाम पर कैसा खेल किया यह लोगों को अब तक याद है। कलमाडी स्कूल ऑफ़ लर्निंग से निकले लोगों के हैडमास्टर हैं " सुरेश कलमाडी" दिल्ली आने से पहले झारखण्ड में इनके चेलों का खेल देख चुका हूँ। ईमानदारी से कहूं तो वहां खेल के नाम पर जो लूट चल रही है उसके पैसे से सुख भोगने का मौका कई दफा इस नाचीज को भी मिल चुका है। इसलिए कलमाडी से ऐसी ही उम्मीद थी, थोड़ी भी हैरानी नहीं है।
हैरान हूँ शीला को लेकर। मोहतरमा 98 से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। जनता के प्रति सीधी जवाबदेह हैं। लेकिन, मैडम चंद दिनों में ही सब कुछ भूल गई। भूल गई खुदी और गन्दी दिल्ली। ऐसी राजधानी जहां जिंदगी रोज मुश्किल होती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर जो गंध इनकी अगुवाई मे मची, उसे कोई कैसे भव्य आगाज से भूल सकता है। अपन सोच रहे थे, मैडम को नींद नहीं आती होगी। पर मैडम तो ओलंपिक के नाम प़र लूट का नया मौका तलाश रही हैं।
सड़कों पर जाम दिल्ली के लिए नई नहीं है। आपने एक लेन खेल को समर्पित कर समस्या और बढ़ा दी। सरकार के पास बस नहीं थी, ब्लू लाइन बंद कर दिया। लोग घंटो स्टॉप पर खड़े रहने को मजबूर हैं। आपके सितम की लम्बी फेहरिस्त है। फिर भी जनता चुप है। इसलिए की हमारे संस्कार हमें "अतिथि देवो भव" बचपन से ही सीखाते हैं. खेल के बाद आपसे हिसाब मांगेगी ये जनता. कलमाडी तो बच भी निकलेंगे, आप कहाँ जाएँगी. बताना होगा आपको इस खेल की सजा हमें कब तक भुगतनी होगी। आपके कर्मो का हिसाब चुनावी मैदान मे नहीं होना है। ये आप भी जानती है कि अगले चुनाव का परिणाम कुछ भी आये, ये आपकी लास्ट इनिंग है क्या खेल के नाम पर हर रोज परेशान रहने वाली जनता की आहें आपको जीवन के शेष काल सुकून से काटने देगी। उमाशंकर जी की पुत्रवधू होने के कारण उम्मीद करता हूँ, आपकी अंतरात्मा जीवित होगी। अभी भी मौका है। दुर्गापूजा का वक़्त है, माते। ओलंपिक का ख्वाब देखना बंद करिए। ऐलान कर दीजिए एक जंग का। उन्हें सजा दिलाने का जिनने राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर कोई और ही खेल खेला है। यकीन मानिए उस दिन आवाज आएगी " शीला जी तुम ओलंपिक लाओ, हम तुम्हारे साथ हैं"। तब आप मुख्यमंत्री हों या न हों, कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्यूंकि तब कोई कलमाडी नहीं होगा, जो आगाज के वक़्त एक पूर्व राष्ट्रपति का नाम भी सही-सही नहीं ले सकता। तब पानी नहीं सरकेगा। आपका बयान सुन किसी को हंसी नहीं आएगी, कोई खंसेगा नहीं। कीबोर्ड टिप-टिप करने लगेंगे। आपकी कट आउट लगेगी, देर रात पेज का ले आउट बदला जाएगा...

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

बयानवीर राहुल गाँधी

राहुल गाँधी। कांग्रेस के युवराज, गाँधी-नेहरु परिवार के चिराग। सिमी और संघ को सामान बताने वाले लाल। राहुल गाँधी को लेकर उम्मीदें हैं (जरूरत से ज्यादा)! लेकिन, क्या केवल बयानों से ही बदलाव लाया जा सकता है? एक सामान्य समझ वाला सख्श भी इससे सहमत नहीं होगा। पर राहुल के इमेज मेकर इस छोटी सी बात को नजरंदाज कर जाते हैं। अब जरा राहुल पर नजर डालिए....
वे संसद मे कलावती की बात कर खूब सुर्खियाँ बटोरते हैं। लेकिन, यही कलावती लोकतंत्र के मैदान में उतरना चाहती हैं तो कोंग्रेसियों के हाथ-पांव फूलने लगते हैं। देश में कलावती की कमी नहीं हैं। यह दूसरी बात है कि राहुल को दूसरी नहीं मिली या फिर उन्हें लग गया है की कलावती दुबारा वाहवाही नहीं दिला सकती।
वे युवाओं की बात करते हैं। लेकिन उनसे परिचर्चा करनी है तो आप चपल पहन कर हॉल मे नहीं आ सकते।
वे मनमोहन सिंह को खुद से ज्यादा काबिल होने का प्रमाण पत्र देते हैं (आखिर किस अधिकार से)। उनका ऐसा करना यह नहीं बताता की देश की कमान किसी परिवार के पास गिरवी पड़ी है।
ऐसे कई वाकिये हैं, जहा राहुल को राहुल ही काटते हैं। कभी काम से (इसका मतलब जमीनी काम से नहीं है), कभी अपने बयान से।
यह सच है की उदारीकरण की संस्कृति को राजनीती नहीं सुहाती। उसे विचारों से भी परहेज है। लेकिन, यह उससे भी बड़ा सच है की समाज बिना राजनीती और विचारों के नहीं बदलती। राहुल यदि बड़े सच को समझना चाहते हैं, तो उन्हें पहले "भारत " को जानना होगा। वे नियमगिरि की पहाड़ियों में "इंडिया" ढूँढ रहे हैं
यहीं वे और उनके इमेज मेकर मात खाते हैं। इसी चक्कर में युवराज सिमी और संघ के अंतर की समझ नहीं पाते हैं और अख़बार के पन्नों से वे निकलकर जमीं पर असरदार नहीं साबित हो पा रहे हैं।